मौंदा के ऑटोमेटेड सेंटर पर घटे आवेदक, पहले रोज 275 तक बनते थे लाइसेंस, अब 30–35 पर सिमटी रफ्तार

लखनऊ –राजधानी में स्थायी ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने की व्यवस्था में 14 सितंबर से हुए बदलाव के बाद आवेदकों की संख्या में भारी गिरावट सामने आई है। अब ड्राइविंग टेस्ट ट्रांसपोर्ट नगर और देवा रोड स्थित एआरटीओ कार्यालयों के ट्रैक पर न होकर काकोरी क्षेत्र के उदितखेड़ा-मौंदा स्थित ऑटोमेटेड ड्राइविंग टेस्ट सेंटर (एडीटीसी) में कराया जा रहा है। सेंसर और कैमरों से लैस इस नई व्यवस्था का उद्देश्य टेस्ट प्रक्रिया को अधिक तकनीकी और पारदर्शी बनाना है, लेकिन शुरुआती दौर में आवेदकों की कम संख्या ने व्यवस्था की व्यावहारिकता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, नई व्यवस्था लागू होने से पहले लखनऊ के ट्रांसपोर्ट नगर और देवा रोड एआरटीओ कार्यालयों से प्रतिदिन औसतन करीब 275 स्थायी ड्राइविंग लाइसेंस बनते थे। 14 सितंबर के बाद एडीटीसी पहुंचने वाले आवेदकों की संख्या कई दिनों में महज 30 से 35 प्रतिदिन बताई गई है।
पहले दिन 47 अभ्यर्थियों ने टेस्ट दिया, जिनमें 17 अभ्यर्थी असफल रहे। विभागीय व्यवस्था के अनुसार असफल अभ्यर्थियों को दोबारा मौका दिया जाएगा। नई प्रक्रिया में आवेदक को पहले एआरटीओ कार्यालय में आवेदन की जांच और बायोमीट्रिक जैसी औपचारिकताएं पूरी करनी होती हैं। इसके बाद वाहन चलाने का टेस्ट देने के लिए एडीटीसी पहुंचना पड़ता है। इससे उन आवेदकों के सामने अतिरिक्त आवागमन की चुनौती खड़ी हो गई है, जिन्हें शहर के अलग-अलग हिस्सों से सेंटर तक पहुंचना है।
महिला, वरिष्ठ नागरिक, दिव्यांग और दूरदराज से आने वाले आवेदकों के लिए दूरी और आने-जाने का खर्च विशेष चिंता का विषय बन सकता है। नई व्यवस्था में सेंसर आधारित ट्रैक और वीडियो रिकॉर्डिंग के माध्यम से ड्राइविंग टेस्ट कराने की व्यवस्था की गई है। इसका उद्देश्य मानवीय हस्तक्षेप कम करना बताया गया है। वहीं, तकनीकी व्यवस्था में सेंसर, कैमरा या सिस्टम में किसी प्रकार की खराबी आने पर अभ्यर्थी की शिकायत का निस्तारण किस स्तर पर और कितनी जल्दी होगा—यह सवाल भी महत्वपूर्ण है।
आवेदकों की संख्या में आई कमी का असर लाइसेंस शुल्क से मिलने वाले राजस्व पर पड़ना स्वाभाविक है। हालांकि, लखनऊ और प्रदेश के सभी 75 जिलों के स्तर पर राजस्व में कितनी वास्तविक कमी हुई है, इसका आधिकारिक आंकड़ा सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होना अभी जरूरी है। इसलिए 150 करोड़ रुपये प्रतिमाह जैसे आंकड़ों की पुष्टि परिवहन विभाग के आधिकारिक आंकड़ों से किया जाना आवश्यक है।
आवेदकों की परेशानी को देखते हुए मांग उठ रही है कि तकनीकी एडीटीसी व्यवस्था के साथ पुराने आरटीओ ट्रैक को भी वैकल्पिक व्यवस्था के तौर पर उपयोग किया जाए। एक सुझाव यह भी है कि जिन अभ्यर्थियों को आरटीओ स्तर पर ड्राइविंग टेस्ट में कठिनाई हो, उन्हें सुधारात्मक प्रशिक्षण के लिए एडीटीसी भेजा जाए। अब देखना होगा कि परिवहन विभाग नई व्यवस्था से जुड़ी आवेदकों की संख्या, राजस्व, तकनीकी शिकायतों और दूरी से जुड़ी परेशानियों का आंकलन कर व्यवस्था में कोई व्यावहारिक बदलाव करता है या नहीं।
ज्ञान सिंह सार्थक टाइम्स न्यूज़









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