
अंबेडकर नगर -सार्थक टाइम्स
जलालपुर स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) में कार्यरत संविदा कर्मचारी—सी.एच.ओ, स्टाफ नर्स, पैथोलॉजी टेक्नीशियन व अन्य एनएचएम स्टाफ—कई महीनों से वेतन न मिलने के विरोध में अनिश्चितकालीन धरने पर बैठे हैं। धरने के चलते स्वास्थ्य केंद्र की नियमित सेवाएं बुरी तरह प्रभावित हो रही हैं, जिसका सीधा खामियाजा स्थानीय नागरिकों को भुगतना पड़ रहा है। कर्मचारियों का कहना है कि तीन-तीन महीने से अधिक समय बीत जाने के बावजूद अभी तक वेतन नहीं दिया गया। बार-बार उच्चाधिकारियों से गुहार लगाने के बाद भी कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। वेतन न मिलने से कर्मचारियों की गृहस्थी चरमरा गई है, बच्चों की पढ़ाई, घर का खर्च, दवाइयां और दैनिक कार्यों की जरूरतें पूरी करना मुश्किल हो गया है। ऐसे में मजबूरीवश उन्हें धरने का रास्ता अपनाना पड़ा।
संविदा कर्मी वही हैं जो सरकार की स्वास्थ्य योजनाओं को जमीनी स्तर पर लागू करते हैं—चाहे वह गांव-गांव जाकर टीकाकरण हो, महामारी से बचाव का कार्य हो या आयुष्मान भारत जैसी महत्वाकांक्षी योजनाओं का संचालन। इसके बावजूद इन्हें महीनों वेतन के लिए भटकना पड़ रहा है।
कर्मचारियों का साफ कहना है कि वेतन कोई मांग नहीं, बल्कि उनका अधिकार है। जब अन्य जिलों में व्यवस्था सुचारु है, तो अंबेडकर नगर में संविदा कर्मियों को वेतन के लिए धरने पर बैठने के लिए मजबूर क्यों किया जा रहा है? जिस के वजह से धरने का असर सीएचसी की दैनिक गतिविधियों पर साफ दिख रहा है। सफाई व्यवस्था, रोगियों के रिकॉर्ड का संधारण, जांच व अन्य सहायक सेवाएं बाधित हैं।

धरने में संजय, विकास, नितिन, शुचि, रविन्द्र, डॉ. अजीत, दिनेश, सालू, मानवेंद्र, साक्षी सहित समस्त सी.एच.ओ, स्टाफ नर्स, पैथोलॉजी टेक्नीशियन और एनएचएम स्टाफ शामिल हैं। कर्मचारियों ने अपनी मांगों को लिखित रूप में स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों को सौंप दिया है, लेकिन अब तक कोई ठोस आश्वासन नहीं मिला। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब स्थायी कर्मचारियों का वेतन हर महीने की पहली तारीख को बिना देरी मिल जाता है, तो संविदा कर्मियों का वेतन आखिर क्यों रोका जाता है? क्या संविदा कर्मचारी सरकार के कर्मचारी नहीं हैं? क्या उन्हें अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए धन की आवश्यकता नहीं होती?
यही संविदा कर्मी हैं जो ठंड के कठिन महीनों में भी गांव-गांव जाकर टीकाकरण जैसे अहम कार्य करते हैं, महामारी से बचाव के लिए दिन-रात मेहनत करते हैं, आयुष्मान भारत योजना जैसी योजनाओं को धरातल पर उतारते हैं। समय से ड्यूटी निभाना, हर लक्ष्य पूरा करना इनकी जिम्मेदारी है, फिर भी इनके मेहनताने के भुगतान में सरकार पीछे क्यों हट जाती है? कर्मचारियों की स्पष्ट मांग है कि वेतन का तत्काल भुगतान किया जाए और भविष्य में समय से वेतन सुनिश्चित किया जाए, ताकि वे सम्मानपूर्वक जीवन यापन कर सकें। यदि सरकार और विभागीय अधिकारी जल्द नहीं चेते, तो इसका असर केवल कर्मचारियों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आम जनता की स्वास्थ्य सेवाएं भी लगातार प्रभावित होती रहेंगी। सरकार और स्वास्थ्य विभाग कब संविदा कर्मियों की पीड़ा को समझते हैं और कब उनकी मेहनत का हक उन्हें समय पर मिलता है।
दिनेश कुमार चौधरी सार्थक टाइम्स









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